विष्णु सहस्रनामावली
क्या आपकी कुंडली में कालसर्प दोष, पितृ दोष या मांगलिक दोष है और आप हर जगह उपाय खोज रहे हैं? क्या आप Depression, Anxiety और Stress जैसी मानसिक समस्याओं से परेशान हैं और कोई स्थायी समाधान नहीं मिल रहा? क्या आप जानते हैं कि एक ऐसा प्राचीन स्तोत्र है जिसे महाभारत के भीष्म पितामह ने अपनी अंतिम सांसों में युधिष्ठिर को बताया था और जो आज भी उतना ही प्रभावशाली है? विष्णु सहस्रनाम - भगवान विष्णु के 1000 दिव्य नाम - केवल एक धार्मिक स्तोत्र नहीं है, बल्कि यह एक वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित उपचार पद्धति है जो आपके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के साथ-साथ आपकी कुंडली के घातक दोषों को भी दूर कर सकती है। लेकिन समस्या यह है कि अधिकतर लोग संस्कृत नहीं जानते और इस शक्तिशाली मंत्र का लाभ नहीं उठा पाते। इस लेख में हम आपको बताएंगे कि कैसे बिना संस्कृत जाने भी आप विष्णु सहस्रनाम का पूरा लाभ उठा सकते हैं, कैसे 2016 के एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक शोध ने इसके Depression और Stress कम करने वाले प्रभावों को प्रमाणित किया है, और कैसे यह आपकी कुंडली के विभिन्न दोषों को दूर कर सकता है। यह जानकारी आपके जीवन को पूरी तरह बदल सकती है और आपको वह शांति दे सकती है जो आप वर्षों से खोज रहे हैं।
महाभारत में छुपा है विष्णु सहस्रनाम का दिव्य रहस्य - जानिए असली स्रोत
विष्णु सहस्रनाम का उल्लेख महाभारत के अनुशासन पर्व में मिलता है। यह तेरहवां पर्व है जो भीष्म पितामह की मृत्युशैय्या पर उनके अंतिम उपदेशों को संजोए हुए है। जब कुरुक्षेत्र का महायुद्ध समाप्त हुआ, तब युधिष्ठिर ने बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म से पूछा - "हे पितामह, इस संसार में कौन सर्वश्रेष्ठ है? किसकी उपासना करने से मनुष्य सभी पापों और कष्टों से मुक्त हो जाता है?"
भीष्म पितामह ने उत्तर दिया कि भगवान विष्णु के 1000 नामों का जाप करना सबसे महान उपाय है। यह विष्णु सहस्रनाम महाभारत के अनुशासन पर्व में अध्याय 149 में वर्णित है (कुछ संस्करणों में अध्याय 134 या 135 के रूप में भी उल्लेखित है - यह विभिन्न पांडुलिपियों के कारण है)। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित यह स्तोत्र 108 श्लोकों में विभाजित है जिसमें भगवान विष्णु के 1000 दिव्य नाम हैं।
महाभारत के अनुशासन पर्व (अध्याय 149) में भीष्म ने कहा - "हे राजन, सुनो वे हजार नाम जो सभी पापों को नष्ट करने में अत्यंत प्रभावशाली हैं, उस सर्वश्रेष्ठ भगवान के, जो इस संसार के स्वामी हैं, अर्थात भगवान विष्णु के।" यह केवल भक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली आध्यात्मिक और वैज्ञानिक उपचार पद्धति है।
वैज्ञानिक शोध का सनसनीखेज खुलासा - Depression, Anxiety और Stress में विष्णु सहस्रनाम का चमत्कारिक प्रभाव
आधुनिक विज्ञान ने भी विष्णु सहस्रनाम के लाभों को प्रमाणित किया है। International Journal of Research in Ayurveda and Pharmacy में 2016 में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण शोध पत्र ने यह सिद्ध किया कि विष्णु सहस्रनाम का नियमित पाठ मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालता है।
यह शोध Kumar Sai Sailesh, Archana Rajagopalan, Soumya Mishra, Udaya Kumar Reddy और Mukkadan Joseph Kurien द्वारा किया गया था। शोध में एक 32 वर्षीय पीएचडी शोधार्थी को शामिल किया गया जो उच्च स्तर के तनाव से पीड़ित था। उन्हें संस्कृत विशेषज्ञ द्वारा सही उच्चारण का प्रशिक्षण दिया गया, और फिर उन्होंने लगातार 12 सप्ताह तक प्रतिदिन सुबह 8 बजे विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया।
शोध में उपयोग किए गए वैज्ञानिक परीक्षण:
- DASS-42 प्रश्नावली - Depression, Anxiety और Stress के स्तर को मापने के लिए
- Serum Cortisol Test - तनाव हार्मोन कोर्टिसोल के स्तर को जांचने के लिए
- Blood Pressure Monitoring - स्वायत्त तंत्रिका तंत्र की कार्यप्रणाली को आंकने के लिए
- MMSE (Mini-Mental State Examination) - संज्ञानात्मक कार्यों को मापने के लिए
- Spatial और Verbal Memory Tests - स्मृति क्षमता को परखने के लिए
शोध के चौंकाने वाले परिणाम:
12 सप्ताह के बाद निम्नलिखित परिणाम सामने आए जो सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण थे (P<0.05 से P<0.001 तक):
- Depression में महत्वपूर्ण कमी - DASS स्कोर में सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण गिरावट दर्ज की गई
- Anxiety का स्तर घटकर सामान्य हो गया - मानसिक चिंता और बेचैनी में उल्लेखनीय कमी
- Stress हार्मोन Cortisol के स्तर में उल्लेखनीय कमी - यह शारीरिक तनाव का सबसे महत्वपूर्ण संकेतक है
- रक्तचाप (Blood Pressure) नियंत्रित होकर सामान्य सीमा में आ गया - Systolic और Diastolic दोनों में सुधार
- Spatial Memory में सुधार हुआ - स्थानिक स्मृति बेहतर हुई
- MMSE स्कोर में वृद्धि - समग्र संज्ञानात्मक क्षमता में सुधार
यह शोध International Journal of Research in Ayurveda and Pharmacy, Volume 7, Supplement 4 (September-October 2016), पृष्ठ 87-89 में प्रकाशित हुआ था। इस शोध ने यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित किया कि विष्णु सहस्रनाम केवल धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक रूप से सिद्ध उपचार पद्धति है।
मानसिक स्वास्थ्य पर विष्णु सहस्रनाम का गहरा प्रभाव
Depression से मुक्ति का आध्यात्मिक-वैज्ञानिक मार्ग
Depression आज की सबसे बड़ी मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। WHO के अनुसार, दुनिया भर में 28 करोड़ से अधिक लोग Depression से पीड़ित हैं। भारत में यह संख्या लगातार बढ़ रही है। विष्णु सहस्रनाम के नियमित पाठ से Depression के लक्षणों में महत्वपूर्ण कमी आती है। इसका कारण यह है कि मंत्रों की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क में Alpha और Theta waves को बढ़ाती हैं, जो मानसिक शांति और स्थिरता लाती हैं।
Anxiety और घबराहट से छुटकारा
Anxiety Disorder आधुनिक जीवन की एक प्रमुख समस्या है। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते समय मन एकाग्र होता है और विचारों की अनियंत्रित धारा रुकती है। यह Mindfulness Meditation के समान प्रभाव देता है। 2016 के शोध में यह पाया गया कि DASS-42 Anxiety स्कोर में सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण कमी आई।
Stress Management और Cortisol नियंत्रण
Cortisol शरीर का प्राथमिक तनाव हार्मोन है। उच्च Cortisol स्तर से हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा और प्रतिरक्षा प्रणाली की कमजोरी हो सकती है। विष्णु सहस्रनाम के नियमित पाठ से Serum Cortisol के स्तर में महत्वपूर्ण कमी आती है, जो शरीर को प्राकृतिक रूप से तनाव-मुक्त करता है।
रक्तचाप (Blood Pressure) पर नियंत्रण
उच्च रक्तचाप या Hypertension एक मूक हत्यारा है जो हृदय रोग और स्ट्रोक का प्रमुख कारण है। 2016 के शोध में यह पाया गया कि 12 सप्ताह के विष्णु सहस्रनाम पाठ के बाद Systolic और Diastolic दोनों रक्तचाप सामान्य सीमा में आ गए। यह स्वायत्त तंत्रिका तंत्र को संतुलित करता है और शरीर को Relaxation Response देता है।
स्मृति और संज्ञानात्मक क्षमता में सुधार
विष्णु सहस्रनाम के पाठ से Spatial Memory में महत्वपूर्ण सुधार होता है। यह मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों को सक्रिय करता है और Neural Plasticity को बढ़ाता है। MMSE स्कोर में भी सुधार दर्ज किया गया, जो समग्र मानसिक कार्यक्षमता में वृद्धि को दर्शाता है।
कुंडली के प्रमुख दोष और विष्णु सहस्रनाम का समाधान
1. कालसर्प दोष - सबसे भयावह ज्योतिषीय दोष
कालसर्प दोष तब बनता है जब कुंडली में सभी ग्रह राहु और केतु के बीच में फंस जाते हैं। "काल" का अर्थ है मृत्यु और "सर्प" का अर्थ है सांप। यह दोष व्यक्ति के जीवन में गंभीर बाधाएं उत्पन्न करता है। इसके 12 प्रकार होते हैं - अनंत कालसर्प, कुलिक कालसर्प, वासुकि कालसर्प, शंखपाल कालसर्प, पद्म कालसर्प, महापद्म कालसर्प, तक्षक कालसर्प, कर्कोटक कालसर्प, शंखचूड़ कालसर्प, घातक कालसर्प, विषधर कालसर्प और शेषनाग कालसर्प।
कालसर्प दोष के लक्षण:
- बार-बार सांप या मृत्यु से संबंधित डरावने सपने आना
- मानसिक तनाव, चिंता और Depression की स्थिति
- करियर में बार-बार रुकावटें और असफलता
- वित्तीय अस्थिरता और धन की कमी
- पारिवारिक कलह और विवाद
- स्वास्थ्य समस्याएं, विशेषकर रक्तचाप और त्वचा रोग
- संतान प्राप्ति में कठिनाई
विष्णु सहस्रनाम से कालसर्प दोष का निवारण:
वैदिक ज्योतिष में भगवान विष्णु को राहु-केतु का नियंत्रक माना गया है। विष्णु सहस्रनाम के नियमित पाठ से कालसर्प दोष के प्रभाव में 60-70% तक कमी आती है। राहु और केतु दोनों को शांत करने के लिए यह सबसे प्रभावी उपाय है। प्रातःकाल स्नान के बाद पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। शनिवार या पंचमी तिथि को इसे करना विशेष फलदायी होता है।
2. पितृ दोष - पूर्वजों का श्राप
पितृ दोष तब उत्पन्न होता है जब कुंडली में सूर्य और राहु नवम भाव (पिता और पूर्वजों का भाव) में एक साथ होते हैं। यह दोष पूर्वजों की अतृप्त आत्माओं या उनके प्रति किए गए अपराधों के कारण बनता है। यह दोष पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होता है और परिवार में गंभीर समस्याएं उत्पन्न करता है।
पितृ दोष के लक्षण:
- संतान प्राप्ति में कठिनाई या बार-बार गर्भपात
- पारिवारिक संबंधों में लगातार तनाव
- अचानक वित्तीय नुकसान और दरिद्रता
- शिक्षा और करियर में अप्रत्याशित रुकावटें
- पुरुष संतान की कमी
- विवाह में देरी या वैवाहिक जीवन में समस्याएं
- मानसिक अशांति और Depression
विष्णु सहस्रनाम से पितृ दोष का निवारण:
भगवान विष्णु को पितृदेव भी कहा जाता है। विष्णु सहस्रनाम के पाठ से पूर्वजों की आत्माओं को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। अमावस्या, सोमवार या संक्रांति के दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना विशेष लाभदायक है। पाठ के बाद ब्राह्मणों को भोजन दान करें और तिल, काले वस्त्र या काले तिल का दान करें। त्रिपिंडी श्राद्ध और पितृ विसर्जन के साथ विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से पितृ दोष पूर्णतः निवारित हो जाता है।
3. मांगलिक दोष (मंगल दोष / कुजा दोष)
मांगलिक दोष तब बनता है जब मंगल ग्रह कुंडली के 1, 2, 4, 7, 8 या 12वें भाव में स्थित होता है। यह दोष विवाह और वैवाहिक जीवन पर गंभीर प्रभाव डालता है। मांगलिक व्यक्ति का विवाह साधारण व्यक्ति से करना अशुभ माना जाता है।
मांगलिक दोष के लक्षण:
- विवाह में अत्यधिक देरी
- वैवाहिक जीवन में कलह और झगड़े
- पति या पत्नी के स्वास्थ्य में समस्याएं
- आर्थिक कठिनाइयां और धन की कमी
- क्रोध और आक्रामकता की समस्या
- मानसिक तनाव और चिंता
- दुर्घटनाओं की संभावना
विष्णु सहस्रनाम से मांगलिक दोष का निवारण:
भगवान विष्णु मंगल ग्रह के अधिपति हैं। मंगलवार को विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से मंगल दोष के प्रभाव में 50-60% तक कमी आती है। लाल रंग के वस्त्र धारण करके, लाल फूलों से भगवान विष्णु की पूजा करके विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। मंगलवार का व्रत रखें और दिन में 108 बार गायत्री मंत्र या हनुमान चालीसा का पाठ करें। विष्णु सहस्रनाम के साथ मंगल मंत्र - "ॐ अं अंगारकाय नमः" का जाप करना भी लाभदायक है।
4. शनि दोष (साढ़ेसाती और ढैया)
शनि ग्रह को न्यायाधीश माना जाता है। जब शनि अशुभ भावों में होता है या कमजोर स्थिति में होता है, तो शनि दोष बनता है। साढ़ेसाती (शनि की साढ़े सात वर्ष की अवधि) और ढैया (ढाई वर्ष की अवधि) के दौरान व्यक्ति को अनेक कष्ट झेलने पड़ते हैं।
शनि दोष के लक्षण:
- जीवन में लगातार संघर्ष और कठिनाइयां
- करियर में रुकावटें और नौकरी में समस्याएं
- शारीरिक और मानसिक रोग
- वित्तीय संकट और ऋण
- पारिवारिक विघटन
- Depression और निराशा
विष्णु सहस्रनाम से शनि दोष का निवारण:
भगवान विष्णु शनि के अधिपति हैं। शनिवार को सूर्योदय से पहले विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। काले तिल, काला वस्त्र, लोहे की वस्तुएं और तेल का दान करें। नीलम रत्न धारण करने से पहले विष्णु सहस्रनाम का नियमित पाठ शुरू कर दें। शनि की शांति के लिए "ॐ शं शनैश्चराय नमः" मंत्र के साथ विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
5. राहु-केतु दोष
राहु और केतु छाया ग्रह हैं जो कुंडली में अशुभ प्रभाव डालते हैं। राहु भ्रम और मोह का कारक है जबकि केतु अचानक घटनाओं और आध्यात्मिक उथल-पुथल का कारक है।
विष्णु सहस्रनाम से राहु-केतु दोष का निवारण:
विष्णु सहस्रनाम में राहु-केतु के प्रभाव को शांत करने की अद्भुत शक्ति है। बुधवार (राहु के लिए) और गुरुवार (केतु के लिए) को विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। गोमेद (राहु के लिए) और लहसुनिया (केतु के लिए) रत्न धारण करने से पहले 40 दिन तक विष्णु सहस्रनाम का पाठ अवश्य करें।
6. नाड़ी दोष
नाड़ी दोष विवाह के समय कुंडली मिलान में आने वाला एक प्रमुख दोष है। जब वर और वधू की समान नाड़ी होती है, तो नाड़ी दोष बनता है, जो संतान स्वास्थ्य और वैवाहिक सुख को प्रभावित करता है।
विष्णु सहस्रनाम से नाड़ी दोष का निवारण:
विवाह से पहले दोनों पक्षों को 21 दिन तक विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए। महामृत्युंजय मंत्र के साथ विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से नाड़ी दोष का प्रभाव कम होता है। कन्या का विवाह पहले भगवान विष्णु से करके (कुंभ विवाह) फिर मानव वर से करने की प्रथा भी नाड़ी दोष के निवारण में सहायक है।
संस्कृत न जानने वालों के लिए आसान समाधान - ऐसे करें विष्णु सहस्रनाम का लाभ
1. ऑडियो सुनकर सीखें (Audio Learning Method)
YouTube पर अनेक प्रामाणिक विष्णु सहस्रनाम के ऑडियो उपलब्ध हैं। MS Subbulakshmi, Anuradha Paudwal, और अन्य प्रसिद्ध गायकों के संस्करण सुनें। रोजाना सुबह इन्हें सुनते रहें, धीरे-धीरे आपको उच्चारण याद हो जाएगा। पहले केवल सुनें (Passive Listening), फिर साथ-साथ बोलने का प्रयास करें (Active Chanting)। आप Spotify, Gaana App, या JioSaavn जैसे Music Streaming Apps पर भी विष्णु सहस्रनाम के ऑडियो डाउनलोड कर सकते हैं।
2. मोबाइल Apps का उपयोग करें
Google Play Store और Apple App Store पर कई बेहतरीन Apps उपलब्ध हैं:
- Vishnu Sahasranamam by Abirami Audio - हिंदी, तमिल और अंग्रेजी में transliteration के साथ
- Sri Vishnu Sahasranama Stotram - ऑडियो के साथ शब्दश्ः पाठ follow करने की सुविधा
- Stotra Nidhi - सभी प्रमुख स्तोत्रों का संग्रह
- Bhakti App - विष्णु सहस्रनाम के साथ अन्य भजन और मंत्र
ये Apps आपको Lyric Mode में पाठ दिखाते हैं, जिससे आप पढ़ते हुए सीख सकते हैं। धीमी गति (Slow Mode) का विकल्प भी होता है जो शुरुआती लोगों के लिए बेहतर है।
3. हिंदी Transliteration का उपयोग करें
यदि आप देवनागरी लिपि पढ़ सकते हैं तो विष्णु सहस्रनाम का हिंदी transliteration version उपयोग करें। जैसे: "विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः" को "विश्वम् विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः" के रूप में पढ़ें। यह मूल संस्कृत से थोड़ा सरल होता है और उच्चारण में भी आसानी होती है।
4. Meaning के साथ पढ़ें
प्रत्येक नाम का अर्थ समझें। जब आप जानते हैं कि "अच्युतः" का अर्थ है "जो कभी गिरता नहीं" या "अनंतः" का अर्थ है "अनंत", तो पाठ में गहराई आती है। मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि जब मैंने पहली बार अर्थ के साथ पाठ किया, तो मुझे अविश्वसनीय शांति और ऊर्जा का अनुभव हुआ। यह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि एक गहरे आध्यात्मिक अनुभव में परिवर्तित हो जाता है।
5. सरल विधि - केवल सुनना भी पर्याप्त है
यदि आप बिल्कुल संस्कृत नहीं जानते और सीखने का समय नहीं है, तो केवल विष्णु सहस्रनामावली भी अत्यंत लाभदायक है। यह भी एक शक्तिशाली साधना है। प्रातःकाल स्नान के बाद भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठें, आंखें बंद करें और पूर्ण एकाग्रता के साथ विष्णु सहस्रनामावली पढ़ें! यह विधि व्यस्त लोगों, बुजुर्गों और बच्चों के लिए सबसे उपयुक्त है।
संकल्प विधि - विष्णु सहस्रनामावली पाठ से पहले का महत्वपूर्ण अनुष्ठान
संकल्प का अर्थ है दृढ़ निश्चय या संकल्प लेना। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले संकल्प अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह आपके मन को स्पष्ट दिशा देता है और आपकी इच्छाशक्ति को केंद्रित करता है।
संकल्प विधि - संस्कृत संस्करण (पूर्ण विधि)
यदि आप संस्कृत जानते हैं या सीखना चाहते हैं, तो यह पूर्ण संकल्प मंत्र है:
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। अद्य ब्रह्मणः द्वितीये परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे बौद्धावतारे [अपना स्थान का नाम] इत्यस्मिन् देशे [अपनी तिथि] मासे [अपना पक्ष] पक्षे [अपनी तिथि] तिथौ [अपना वार] वासरे शुभ [अपना नक्षत्र] नक्षत्रे शुभयोगे शुभकरणे एवं गुणविशेषण विशिष्टायां शुभतिथौ [अपना गोत्र] गोत्रोत्पन्नः [अपना नाम] अहं मम आत्मनः श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं [अपनी इच्छा] सिद्ध्यर्थं श्रीमहाविष्णु प्रीत्यर्थं श्रीविष्णुसहस्रनाम स्तोत्र पाठं करिष्ये।
संकल्प विधि - सरलीकृत हिंदी संस्करण (आसान विधि)
यदि आपको संस्कृत मंत्र कठिन लग रहा है, तो यह सरल हिंदी संकल्प पर्याप्त है और समान रूप से प्रभावी है:
संक्षिप्त संकल्प विधि - 5 सरल कदम:
- कदम 1: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- कदम 2: दाहिने हाथ में जल, फूल और अक्षत (चावल के दाने) लें।
- कदम 3: आंखें बंद करें और मन में या धीरे से बोलें:
- कदम 4: हाथ में रखे जल, फूल और अक्षत को भगवान विष्णु की मूर्ति/तस्वीर के सामने छोड़ दें या किसी पवित्र स्थान पर रख दें।
- कदम 5: अब विष्णु सहस्रनामावली का पाठ शुरू करें।
"ॐ, आज [दिनांक और दिन का नाम] को, मैं [अपना नाम], [अपना गोत्र यदि पता है, नहीं तो छोड़ दें] गोत्र से संबंधित, भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए, [अपनी इच्छा - जैसे "मेरे कुंडली के कालसर्प दोष को दूर करने के लिए" या "मेरी मानसिक शांति के लिए" या "मेरे परिवार की भलाई के लिए"] विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने का संकल्प लेता/लेती हूं।"
संकल्प का सबसे सरल रूप (अति व्यस्त लोगों के लिए):
यदि आपके पास समय बहुत कम है, तो बस मन में कहें:
"हे भगवान विष्णु, मैं आपकी शरण में आया/आई हूं। मेरे [अपनी समस्या बताएं] की समाप्ति के लिए आपके दिव्य नामों का स्मरण करता/करती हूं। कृपया मुझे आशीर्वाद दें।"
यह अत्यंत सरल है और पूर्णतः मान्य है। याद रखें, भक्ति सबसे महत्वपूर्ण है, न कि कर्मकांड की जटिलता।
विष्णु सहस्रनामावली पाठ की विधि - सही तरीका
1. उचित समय
- सबसे उत्तम समय: ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से 1.5 घंटे पहले)
- दूसरा विकल्प: सूर्योदय के समय
- तीसरा विकल्प: संध्या समय (सूर्यास्त के समय)
- यदि व्यस्त हैं: दिन में किसी भी समय, लेकिन नियमितता बनाए रखें
2. स्थान और वातावरण
- स्वच्छ और शांत स्थान चुनें
- अगरबत्ती या दीपक जलाएं
- भगवान विष्णु की तस्वीर या मूर्ति रखें (यदि संभव हो)
- तुलसी का पौधा पास में रखें (यदि उपलब्ध हो)
3. पाठ की अवधि
- पूर्ण विष्णु सहस्रनाम पाठ: लगभग 30-40 मिनट
- यदि समय कम है: केवल ध्यान श्लोक और पहले 10 श्लोक (10 मिनट)
- न्यूनतम: केवल ध्यान मंत्र और श्लोक 1 (5 मिनट)
4. विशेष नियम
- पाठ के दौरान मौन रहें और एकाग्र रहें
- बीच में बातचीत न करें
- मोबाइल फोन साइलेंट रखें
- पाठ पूरा करने के बाद कुछ मिनट मौन रहें
- भगवान विष्णु को प्रणाम करें
विष्णु सहस्रनाम के अन्य चमत्कारिक लाभ
आर्थिक समृद्धि और धन प्राप्ति
भगवान विष्णु को लक्ष्मीपति कहा जाता है। विष्णु सहस्रनामावली के नियमित पाठ से वित्तीय स्थिति में सुधार होता है। मेरे एक मित्र ने बताया कि जब उनका व्यापार ठप था और कर्ज में डूबे थे, तब उन्होंने 48 दिन तक लगातार विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया। आश्चर्यजनक रूप से, 50वें दिन उन्हें एक बड़ा अनुबंध मिला जिसने उनकी सारी समस्याएं हल कर दीं। यह संयोग नहीं, बल्कि विष्णु कृपा थी।
संतान प्राप्ति में सहायक
संतान प्राप्ति में कठिनाई होने पर विष्णु सहस्रनाम अत्यंत लाभदायक है। विशेषकर यदि कुंडली में पितृ दोष या नाड़ी दोष है, तो यह चमत्कारिक परिणाम देता है। गर्भधारण से पहले और गर्भावस्था के दौरान भी विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना शुभ है।
शत्रु निवारण और कानूनी समस्याओं से मुक्ति
यदि आपके शत्रु हैं या कोई कानूनी मामला चल रहा है, तो विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। भगवान विष्णु न्याय के देवता हैं और सत्य की रक्षा करते हैं। यह षड्यंत्रों से भी बचाता है।
करियर में उन्नति और सफलता
नौकरी में पदोन्नति, नया व्यापार, या करियर में सफलता के लिए विष्णु सहस्रनाम बेहद प्रभावशाली है। गुरुवार को विशेष रूप से पाठ करें।
रोग निवारण और दीर्घायु
हृदय रोग, मधुमेह, रक्तचाप, और अन्य पुरानी बीमारियों में विष्णु सहस्रनाम का पाठ लाभदायक है। यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
वैवाहिक सुख और पारिवारिक शांति
पति-पत्नी के बीच कलह हो, सास-बहू का झगड़ा हो, या पारिवारिक विघटन हो, तो सभी सदस्यों को मिलकर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए। यह घर में सकारात्मक ऊर्जा लाता है और संबंधों को मधुर बनाता है।
आधुनिक जीवन में विष्णु सहस्रनामावली की प्रासंगिकता
आज का युग तनाव, प्रतिस्पर्धा और अनिश्चितता का युग है। WHO की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर 7 में से 1 व्यक्ति किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से पीड़ित है। Depression और Anxiety की दर तेजी से बढ़ रही है। COVID-19 महामारी के बाद यह समस्या और भी गंभीर हो गई है।
ऐसे में विष्णु सहस्रनामावली एक सम्पूर्ण समाधान है जो:
- मानसिक स्वास्थ्य में सुधार करता है (वैज्ञानिक रूप से सिद्ध)
- शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है
- ज्योतिषीय दोषों को दूर करता है
- आध्यात्मिक उन्नति देता है
- कोई साइड इफेक्ट नहीं है
- पूरी तरह मुफ्त है
- कहीं भी, कभी भी किया जा सकता है
व्यक्तिगत अनुभव - मेरे मित्र की कहानी
उसके ही शब्दों में , "मैं खुद एक Stress और Anxiety का शिकार था। 2019 में जब मेरी नौकरी चली गई और कर्ज बढ़ता जा रहा था, तब मेरी मां ने मुझे विष्णु सहस्रनामावली पढ़ने को कहा। पहले मैंने इसे केवल धार्मिक अंधविश्वास समझा। लेकिन निराशा में मैंने यह प्रयोग किया। प्रतिदिन सुबह 30 मिनट विष्णु सहस्रनामावली पढ़ना शुरू किया, क्योंकि संस्कृत पढ़ना मेरे बस की बात न थी लेकिन आसान मन्त्र जरूर पढ़ सकता हूँ, और विष्णु सहस्रनामावली में बस भगवान् के नाम के पहले श्री और बाद में नमः लगाकर बोलना होता है तो यह अधिक सहज था मेरे लिए।"
पहले सप्ताह में कुछ खास नहीं हुआ, लेकिन दूसरे सप्ताह से मुझे महसूस हुआ कि मेरी नींद बेहतर हो रही है और दिन भर की चिंता कम हो रही है। तीसरे सप्ताह में मेरा एक पुराना मित्र अचानक मिला और उसने मुझे एक बेहतरीन Job Opportunity दी। चौथे सप्ताह तक मैं पूरी तरह बदल गया था - मानसिक रूप से शांत, आत्मविश्वासी और सकारात्मक।
आज 5 साल बाद भी मैं रोजाना विष्णु सहस्रनाम पढता हूं। यह मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन गया है। मैं दावे से कह सकता हूं कि यह काम करता है, लेकिन धैर्य और नियमितता जरूरी है।
सावधानियां और महत्वपूर्ण बिंदु
- निरंतरता सबसे महत्वपूर्ण है: एक दिन पाठ करके चमत्कार की उम्मीद न रखें। कम से कम 40-48 दिन लगातार करें।
- श्रद्धा और विश्वास रखें: संदेह के साथ किया गया पाठ पूर्ण लाभ नहीं देता।
- सही उच्चारण ध्यान दें: गलत उच्चारण से कोई हानि नहीं होती, लेकिन लाभ कम हो सकता है।
- पवित्रता बनाए रखें: मांसाहार, शराब और तंबाकू से बचें (यदि संभव हो)।
- चिकित्सकीय उपचार न छोड़ें: विष्णु सहस्रनाम एक पूरक उपाय है, न कि चिकित्सा का विकल्प। Depression या अन्य गंभीर बीमारी में डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।
- दोषों के लिए अन्य उपाय भी करें: केवल विष्णु सहस्रनाम पर निर्भर न रहें। योग्य ज्योतिषी से परामर्श लें और अन्य उपाय भी करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
क्या बिना संस्कृत जाने विष्णु सहस्रनाम का लाभ मिलता है?
हां, बिल्कुल! केवल सुनना भी उतना ही प्रभावी है। श्रद्धा और भक्ति सबसे महत्वपूर्ण है, भाषा नहीं। आप ऑडियो सुन सकते हैं या हिंदी transliteration पढ़ सकते हैं।
विष्णु सहस्रनामावली कितने दिन में फल देता है?
यह व्यक्ति की समस्या और श्रद्धा पर निर्भर करता है। सामान्यतः 40-48 दिन में महत्वपूर्ण परिणाम दिखने लगते हैं। मानसिक शांति 2-3 सप्ताह में ही महसूस होने लगती है।
क्या महिलाएं मासिक धर्म के दौरान विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर सकती हैं?
भगवान विष्णु सर्वव्यापी हैं और किसी भी स्थिति में भक्त को स्वीकार करते हैं। आधुनिक विचारधारा के अनुसार, महिलाएं किसी भी समय पाठ कर सकती हैं। हालांकि, कुछ परंपरावादी परिवारों में इसे वर्जित माना जाता है - यह आपकी व्यक्तिगत मान्यता पर निर्भर है।
क्या विष्णु सहस्रनामावली रात में सुन सकते हैं?
हां, रात में सोते समय भी सुन सकते हैं। यह नींद को बेहतर बनाता है और बुरे सपनों से बचाता है। हालांकि, सबसे उत्तम समय सुबह का है।
क्या विष्णु सहस्रनामावली का पाठ करते समय गलती हो जाए तो क्या करें?
कोई चिंता की बात नहीं। भगवान आपकी भक्ति देखते हैं, गलती नहीं। जहां गलती हुई, वहां से फिर शुरू करें या आगे बढ़ जाएं। जानबूझकर गलती न करें, लेकिन अनजाने में हुई गलती क्षमा योग्य है।
कालसर्प दोष के लिए कितने दिन विष्णु सहस्रनामावली करना चाहिए?
कालसर्प दोष के लिए कम से कम 108 दिन लगातार विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए। गंभीर कालसर्प दोष में 1 साल तक नियमित पाठ करें। साथ ही काल सर्प दोष पूजा भी करवाएं।
क्या Depression की दवाई के साथ विष्णु सहस्रनामावली कर सकते हैं?
हां, बिल्कुल! विष्णु सहस्रनामावली दवाई का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक है। डॉक्टर की दवाई लेते रहें और साथ में विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। यह दवाई के प्रभाव को बढ़ाएगा और साइड इफेक्ट को कम करेगा।
क्या बच्चे विष्णु सहस्रनामावली पढ़ सकते हैं?
हां, बच्चे विष्णु सहस्रनामावली पढ़ सकते हैं। यह उनकी एकाग्रता, स्मृति और मानसिक विकास में सहायक है। परीक्षा के समय विशेष रूप से लाभदायक है। छोटे बच्चों को सोते समय धीमी आवाज में सुनाएं।
विष्णु सहस्रनाम और विष्णु सहस्रनामावली में क्या अंतर है?
विष्णु सहस्रनाम 108 श्लोकों में विष्णु के 1000 नामों का वर्णन है जिसमें ध्यान श्लोक, फल श्रुति आदि सब कुछ शामिल है। दूसरी ओर, विष्णु सहस्रनामावली केवल भगवान विष्णु के 1000 नामों की सूची है। सहस्रनामावली संक्षिप्त है और व्यस्त लोगों के लिए अधिक व्यावहारिक है।
क्या विष्णु सहस्रनामावली से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है?
हां, विष्णु सहस्रनामावली घर और व्यक्ति की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है। यह बुरी नजर, काला जादू, और नकारात्मक विचारों से भी बचाता है। घर में रोजाना विष्णु सहस्रनाम बजाने से वातावरण पवित्र और सकारात्मक बनता है।
विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से कौन-कौन से आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं?
यह पाठ मानसिक शांति, आत्मविश्वास, और भक्ति को गहरा करता है। विष्णु सहस्रनाम का नियमित जप नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देता है।
विष्णु सहस्रनाम और विष्णु सहस्रनामावली - कौन सा चुनें?
बहुत से लोग इस बात को लेकर भ्रमित रहते हैं कि उन्हें पूरा विष्णु सहस्रनाम पढ़ना चाहिए या केवल सहस्रनामावली। मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह सकता हूं कि दोनों ही समान रूप से शक्तिशाली हैं।
विष्णु सहस्रनाम चुनें यदि:
- आपके पास 30-40 मिनट का समय है
- आप पूर्ण विधि-विधान के साथ पाठ करना चाहते हैं
- आप श्लोकों का अर्थ समझना चाहते हैं
- आप आध्यात्मिक गहराई चाहते हैं
- सप्ताह में 1-2 बार गहन पूजा करना चाहते हैं
विष्णु सहस्रनामावली चुनें यदि:
- आपके पास केवल 10-15 मिनट हैं
- आप रोजाना नियमित रूप से पाठ करना चाहते हैं
- आप व्यस्त हैं और सरल विधि चाहते हैं
- आप यात्रा में हैं या बाहर हैं
- आप केवल भगवान के नामों का जाप करना चाहते हैं
मेरी सिफारिश:
सप्ताह में एक बार (रविवार या गुरुवार) पूर्ण विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और बाकी दिनों में विष्णु सहस्रनामावली का पाठ करें। यह सबसे संतुलित और प्रभावी तरीका है। याद रखें - नियमितता > पूर्णता। बेहतर है कि आप रोजाना 10 मिनट सहस्रनामावली पढ़ें, बजाय महीने में एक बार 40 मिनट का पूर्ण पाठ करें।
निष्कर्ष - आपका जीवन बदलने का समय आ गया है
विष्णु सहस्रनामावली केवल एक धार्मिक पाठ नहीं है - यह एक जीवन बदलने वाली शक्ति है। यह प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का अद्भुत संगम है। 2016 के वैज्ञानिक शोध ने सिद्ध कर दिया है कि यह Depression, Anxiety और Stress को कम करता है। वैदिक ज्योतिष ने सदियों से इसे कालसर्प दोष, पितृ दोष, मांगलिक दोष और अन्य सभी दोषों का सर्वोत्तम उपाय बताया है।
आज से ही शुरू करें। संस्कृत न जानने का बहाना न बनाएं। YouTube पर ऑडियो सुनें, Mobile App download करें, या विष्णु सहस्रनामावली पढ़ें। बस 10-15 मिनट रोजाना निकालें। सरल संकल्प लें और श्रद्धा के साथ शुरुआत करें।
याद रखें - भगवान विष्णु आपकी भाषा नहीं, आपकी भक्ति देखते हैं। आपका विश्वास ही आपकी सबसे बड़ी शक्ति है। 40-48 दिन का धैर्य रखें और परिणाम देखें।
आपका जीवन बदलने का समय आ गया है। आज ही विष्णु सहस्रनाम को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं और अनुभव करें वह शांति, समृद्धि और सफलता जो आप हमेशा से चाहते थे।
🔻विष्णु सहस्रनामावली 🔻
हरि: ओम
श्री विश्वस्मै नमः ।
श्री विष्णवे नमः ।
श्री वषट्काराय नमः ।
श्री भूतभव्यभवत्प्रभवे नमः ।
श्री भूतकृते नमः ।
श्री भूतभृते नमः ।
श्री भावाय नमः ।
श्री भूतात्मने नमः ।
श्री भूतभावनाय नमः ।
श्री पूतात्मने नमः । १० ॥
श्री परमात्मने नमः ।
श्री मुक्तानाम्परमगतये नमः ।
श्री अव्ययाय नमः ।
श्री पुरुषाय नमः ।
श्री साक्षिणे नमः ।
श्री क्षेत्रज्ञाय नमः ।
श्री अक्षराय नमः ।
श्री योगाय नमः ।
श्री योगविदांनेत्रे नमः ।
श्री प्रधानपुरुषेश्वराय नमः । २० ॥
श्री नारसिंहवपुषे नमः ।
श्री श्रीमते नमः ।
श्री केशवाय नमः ।
श्री पुरुषोत्तमाय नमः ।
श्री सर्वस्मै नमः ।
श्री शर्वाय नमः ।
श्री शिवाय नमः ।
श्री स्थाणवे नमः ।
श्री भूतादये नमः ।
श्री निधयेऽव्ययाय नमः । ३० ॥
श्री सम्भवाय नमः ।
श्री भावनाय नमः ।
श्री भर्त्रे नमः ।
श्री प्रभवाय नमः ।
श्री प्रभवे नमः ।
श्री ईश्वराय नमः ।
श्री स्वयम्भुवे नमः ।
श्री शम्भवे नमः ।
श्री आदित्याय नमः ।
श्री पुष्कराक्षाय नमः । ४० ॥
श्री महास्वनाय नमः ।
श्री अनादिनिधनाय नमः ।
श्री धात्रे नमः ।
श्री विधात्रे नमः ।
श्री धातुरुत्तमाय नमः ।
श्री अप्रमेयाय नमः ।
श्री हृषीकेशाय नमः ।
श्री पद्मनाभाय नमः ।
श्री अमरप्रभवे नमः ।
श्री विश्वकर्मणे नमः । ५० ॥
श्री मनवे नमः ।
श्री त्वष्ट्रे नमः ।
श्री स्थविष्ठाय नमः ।
श्री स्थविराय ध्रुवाय नमः ।
श्री अग्रह्याय नमः ।
श्री शाश्वताय नमः ।
श्री कृष्णाय नमः ।
श्री लोहिताक्षाय नमः ।
श्री प्रतर्दनाय नमः ।
श्री प्रभूताय नमः । ६० ॥
श्री त्रिककुब्धाम्ने नमः ।
श्री पवित्राय नमः ।
श्री मङ्गलाय परस्मै नमः ।
श्री ईशानाय नमः ।
श्री प्राणदाय नमः ।
श्री प्राणाय नमः ।
श्री ज्येष्ठाय नमः ।
श्री श्रेष्ठाय नमः ।
श्री प्रजापतये नमः ।
श्री हिरण्यगर्भाय नमः । ७० ॥
श्री भूगर्भाय नमः ।
श्री माधवाय नमः ।
श्री मधुसूदनाय नमः ।
श्री ईश्वराय नमः ।
श्री विक्रमिणे नमः ।
श्री धन्विने नमः ।
श्री मेधाविने नमः ।
श्री विक्रमाय नमः ।
श्री क्रमाय नमः ।
श्री अनुत्तमाय नमः । ८० ॥
श्री दुराधर्षाय नमः ।
श्री कृतज्ञाय नमः ।
श्री कृतये नमः ।
श्री आत्मवते नमः ।
श्री सुरेशाय नमः ।
श्री शरणाय नमः ।
श्री शर्मणे नमः ।
श्री विश्वरेतसे नमः ।
श्री प्रजाभवाय नमः ।
श्री अन्हे नमः । ९० ॥
श्री संवत्सराय नमः ।
श्री व्यालाय नमः ।
श्री प्रत्ययाय नमः ।
श्री सर्वदर्शनाय नमः ।
श्री अजाय नमः ।
श्री सर्वेश्वराय नमः ।
श्री सिद्धाय नमः ।
श्री सिद्धये नमः ।
श्री सर्वादये नमः ।
श्री अच्युताय नमः । १०० ॥
श्री वृषाकपये नमः ।
श्री अमेयात्मने नमः ।
श्री सर्वयोगविनिःसृताय नमः ।
श्री वसवे नमः ।
श्री वसुमनसे नमः ।
श्री सत्याय नमः ।
श्री समात्मने नमः ।
श्री सम्मिताय नमः ।
श्री समाय नमः ।
श्री अमोघाय नमः । ११० ॥
श्री पुण्डरीकाक्षाय नमः ।
श्री वृषकर्मणे नमः ।
श्री वृषाकृतये नमः ।
श्री रुद्राय नमः ।
श्री बहुशिरसे नमः ।
श्री बभ्रवे नमः ।
श्री विश्वयोनये नमः ।
श्री शुचिश्रवसे नमः ।
श्री अमृताय नमः ।
श्री शाश्वतस्थाणवे नमः । १२० ॥
श्री वरारोहाय नमः ।
श्री महातपसे नमः ।
श्री सर्वगाय नमः ।
श्री सर्वविद्भानवे नमः ।
श्री विष्वक्सेनाय नमः ।
श्री जनार्दनाय नमः ।
श्री वेदाय नमः ।
श्री वेदविदे नमः ।
श्री अव्यङ्गाय नमः ।
श्री वेदाङ्गाय नमः । १३० ॥
श्री वेदविदे नमः ।
श्री कवये नमः ।
श्री लोकाध्यक्षाय नमः ।
श्री सुराध्यक्षाय नमः ।
श्री धर्माध्यक्षाय नमः ।
श्री कृताकृताय नमः ।
श्री चतुरात्मने नमः ।
श्री चतुर्व्यूहाय नमः ।
श्री चतुर्द्रम्ष्ट्राय नमः ।
श्री चतुर्भुजाय नमः । १४० ॥
श्री भ्राजिष्णवे नमः ।
श्री भोजनाय नमः ।
श्री भोक्त्रे नमः ।
श्री सहिष्णवे नमः ।
श्री जगदादिजाय नमः ।
श्री अनघाय नमः ।
श्री विजयाय नमः ।
श्री जेत्रे नमः । १५० ॥
श्री विश्वयोनये नमः ।
श्री पुनर्वसवे नमः ।
श्री उपेन्द्राय नमः ।
श्री वामनाय नमः ।
श्री प्रांशवे नमः ।
श्री अमोघाय नमः ।
श्री शुचये नमः ।
श्री उर्जिताय नमः ।
श्री अतीन्द्राय नमः ।
श्री सङ्ग्रहाय नमः ।
श्री सर्गाय नमः ।
श्री धृतात्मने नमः । १६० ॥
श्री नियमाय नमः ।
श्री यमाय नमः ।
श्री वेद्याय नमः ।
श्री वैद्याय नमः ।
श्री सदायोगिने नमः ।
श्री वीरघ्ने नमः ।
श्री माधवाय नमः ।
श्री मधवे नमः ।
श्री अतीन्द्रियाय नमः ।
श्री महामायाय नमः ।
श्री महोत्साहाय नमः ।
श्री महाबलाय नमः ।
श्री महाबुद्धये नमः ।
श्री महावीर्याय नमः ।
श्री महाशक्तये नमः ।
श्री महाद्युतये नमः ।
श्री अनिर्देश्यवपुषे नमः ।
श्री श्रीमते नमः ।
श्री अमेयात्मने नमः ।
श्री महाद्रिधृते नमः । १८० ॥
श्री महेश्वासाय नमः ।
श्री महीभर्त्रे नमः ।
श्री श्रीनिवासाय नमः ।
श्री सताङ्गतये नमः ।
श्री अनिरुद्धाय नमः ।
श्री सुरानन्दाय नमः ।
श्री गोविन्दाय नमः ।
श्री गोविदाम्पतये नमः ।
श्री मरीचये नमः ।
श्री दमनाय नमः ।
श्री हंसाय नमः ।
श्री सुपर्णाय नमः ।
श्री भुजगोत्तमाय नमः ।
श्री हिरण्यनाभाय नमः ।
श्री सुतपसे नमः ।
श्री पद्मनाभाय नमः ।
श्री प्रजापतये नमः ।
श्री अमृत्यवे नमः ।
श्री सर्वदृशे नमः ।
श्री सिंहाय नमः । २०० ॥
श्री सन्धात्रे नमः ।
श्री सन्धिमते नमः ।
श्री स्थिराय नमः ।
श्री अजाय नमः ।
श्री दुर्मर्षणाय नमः ।
श्री शास्त्रे नमः ।
श्री विश्रुतात्मने नमः ।
श्री सुरारिघ्ने नमः ।
श्री गुरुवे नमः ।
श्री गुरुतमाय नमः ।
श्री धाम्ने नमः ।
श्री सत्याय नमः ।
श्री सत्यपराक्रमाय नमः ।
श्री निमिषाय नमः ।
श्री अनिमिषाय नमः ।
श्री स्रग्वीणे नमः ।
श्री वाचस्पतये उदारधिये नमः ।
श्री अग्रण्ये नमः ।
श्री ग्रामण्ये नमः ।
श्री श्रीमते नमः । २२० ॥
श्री न्यायाय नमः ।
श्री नेत्रे नमः ।
श्री समीरणाय नमः ।
श्री सहस्रमूर्ध्ने नमः ।
श्री विश्वात्मने नमः ।
श्री सहस्राक्षाय नमः ।
श्री सहस्रपदे नमः ।
श्री आवर्तनाय नमः ।
श्री निवृत्तात्मने नमः ।
श्री संवृताय नमः ।
श्री सम्प्रमर्दनाय नमः ।
श्री अहःसंवर्तकाय नमः ।
श्री वह्नये नमः ।
श्री अनिलाय नमः ।
श्री धरणीधराय नमः ।
श्री सुप्रसादाय नमः ।
श्री प्रसन्नात्मने नमः ।
श्री विश्वधृषे नमः ।
श्री विश्वभुजे नमः ।
श्री विभवे नमः । २४० ॥
श्री सत्कर्त्रे नमः ।
श्री सत्कृताय नमः ।
श्री साधवे नमः ।
श्री जह्नवे नमः ।
श्री नारायणाय नमः ।
श्री नराय नमः ।
श्री असङ्ख्येयाय नमः ।
श्री अप्रमेयात्मने नमः ।
श्री विशिष्टाय नमः ।
श्री शिष्टकृते नमः ।
श्री शुचये नमः ।
श्री सिद्धार्थाय नमः ।
श्री सिद्धसङ्कल्पाय नमः ।
श्री सिद्धिदाय नमः ।
श्री सिद्धिसाधनाय नमः ।
श्री वृषाहिणे नमः ।
श्री वृषभाय नमः ।
श्री विष्णवे नमः ।
श्री वृषपर्वणे नमः ।
श्री वृषोदराय नमः । २६० ॥
श्री वर्धनाय नमः ।
श्री वर्धमानाय नमः ।
श्री विविक्ताय नमः ।
श्री श्रुतिसागराय नमः ।
श्री सुभुजाय नमः ।
श्री दुर्धराय नमः ।
श्री वाग्मिने नमः ।
श्री महेन्द्राय नमः ।
श्री वसुदाय नमः ।
श्री वसवे नमः । २७० ॥
श्री नैकरूपाय नमः ।
श्री बृहद्रूपाय नमः ।
श्री शिपिविष्टाय नमः ।
श्री प्रकाशनाय नमः ।
श्री ओजस्तेजोद्युतिधराय नमः ।
श्री प्रकाशात्मने नमः ।
श्री प्रतापनाय नमः ।
श्री ऋद्धाय नमः ।
श्री स्पष्टाक्षराय नमः ।
श्री मन्त्राय नमः । २८० ॥
श्री चन्द्रांशवे नमः ।
श्री भास्करद्युतये नमः ।
श्री अमृतांशूद्भवाय नमः ।
श्री भानवे नमः ।
श्री शशिबिन्दवे नमः ।
श्री सुरेश्वराय नमः ।
श्री औषधाय नमः ।
श्री जगतस्सेतवे नमः ।
श्री सत्यधर्मपराक्रमाय नमः ।
श्री भूतभव्यभवन्नाथाय नमः । २९० ॥
श्री पवनाय नमः ।
श्री पावनाय नमः ।
श्री अनलाय नमः ।
श्री कामघ्ने नमः ।
श्री कामकृते नमः ।
श्री कान्ताय नमः ।
श्री कामाय नमः ।
श्री कामप्रदाय नमः ।
श्री प्रभवे नमः ।
श्री युगादिकृते नमः । ३०० ॥
श्री युगावर्ताय नमः ।
श्री नैकमायाय नमः ।
श्री महाशनाय नमः ।
श्री अदृश्याय नमः ।
श्री व्यक्तरूपाय नमः ।
श्री सहस्रजिते नमः ।
श्री अनन्तजिते नमः ।
श्री इष्टाय नमः ।
श्री विशिष्टाय नमः ।
श्री शिष्टेष्टाय नमः । ३१० ॥
श्री शिखण्डिने नमः ।
श्री नहुषाय नमः ।
श्री वृषाय नमः ।
श्री क्रोधग्ने नमः ।
श्री क्रोधकृत्कर्त्रे नमः ।
श्री विश्वबाहवे नमः ।
श्री महीधराय नमः ।
श्री अच्युताय नमः ।
श्री प्रथिताय नमः ।
श्री प्राणाय नमः । ३२० ॥
श्री प्राणदाय नमः ।
श्री वासवानुजाय नमः ।
श्री अपांनिधये नमः ।
श्री अधिष्ठानाय नमः ।
श्री अप्रमत्ताय नमः ।
श्री प्रतिष्ठिताय नमः ।
श्री स्कन्दाय नमः ।
श्री स्कन्दधराय नमः ।
श्री धुर्याय नमः ।
श्री वरदाय नमः ।
श्री वायुवाहनाय नमः ।
श्री वासुदेवाय नमः ।
श्री बृहद्भानवे नमः ।
श्री आदिदेवाय नमः ।
श्री पुरन्दराय नमः ।
श्री अशोकाय नमः ।
श्री तारणाय नमः ।
श्री ताराय नमः ।
श्री शूराय नमः ।
श्री शौरये नमः । ३४० ॥
श्री जनेश्वराय नमः ।
श्री अनुकूलाय नमः ।
श्री शतावर्ताय नमः ।
श्री पद्मिने नमः ।
श्री पद्मनिभेक्षणाय नमः ।
श्री पद्मनाभाय नमः ।
श्री अरविन्दाक्षाय नमः ।
श्री पद्मगर्भाय नमः ।
श्री शरीरभृते नमः ।
श्री महर्धये नमः । ३५० ॥
श्री ऋद्धाय नमः ।
श्री वृद्धात्मने नमः ।
श्री महाक्षाय नमः ।
श्री गरुडध्वजाय नमः ।
श्री अतुलाय नमः ।
श्री शरभाय नमः ।
श्री भीमाय नमः ।
श्री समयज्ञाय नमः ।
श्री हविर्हरये नमः ।
श्री सर्वलक्षणलक्षण्याय नमः ।
श्री लक्ष्मीवते नमः ।
श्री समितिञ्जयाय नमः ।
श्री विक्षराय नमः ।
श्री रोहिताय नमः ।
श्री मार्गाय नमः ।
श्री हेतवे नमः ।
श्री दामोदराय नमः ।
श्री सहाय नमः ।
श्री महीधराय नमः ।
श्री महाभागाय नमः । ३७० ॥
श्री वेगवते नमः ।
श्री अमिताशनाय नमः ।
श्री उद्भवाय नमः ।
श्री क्षोभणाय नमः ।
श्री देवाय नमः ।
श्री श्रीगर्भाय नमः ।
श्री परमेश्वराय नमः ।
श्री करणाय नमः ।
श्री कारणाय नमः ।
श्री कर्त्रे नमः । ३८० ॥
श्री विकर्त्रे नमः ।
श्री गहनाय नमः ।
श्री गुहाय नमः ।
श्री व्यवसायाय नमः ।
श्री व्यवस्थानाय नमः ।
श्री संस्थानाय नमः ।
श्री स्थानदाय नमः ।
श्री ध्रुवाय नमः ।
श्री परर्धये नमः ।
श्री परमस्पष्टाय नमः ।
श्री तुष्टाय नमः ।
श्री पुष्टाय नमः ।
श्री शुभेक्षणाय नमः ।
श्री रामाय नमः ।
श्री विरामाय नमः ।
श्री विरजाय नमः ।
श्री मार्गाय नमः ।
श्री नेयाय नमः ।
श्री नयाय नमः ।
श्री अनयाय नमः । ४०० ॥
श्री वीराय नमः ।
श्री शक्तिमतां श्रेष्ठाय नमः ।
श्री धर्माय नमः ।
श्री धर्मविदुत्तमाय नमः ।
श्री वैकुण्ठाय नमः ।
श्री पुरुषाय नमः ।
श्री प्राणाय नमः ।
श्री प्राणदाय नमः ।
श्री प्रणवाय नमः ।
श्री पृथवे नमः ।
श्री हिरण्यगर्भाय नमः ।
श्री शत्रुघ्नाय नमः ।
श्री व्याप्ताय नमः ।
श्री वायवे नमः ।
श्री अधोक्षजाय नमः ।
श्री ऋतवे नमः ।
श्री सुदर्शनाय नमः ।
श्री कालाय नमः ।
श्री परमेष्ठिने नमः ।
श्री परिग्रहाय नमः । ४२० ॥
श्री उग्राय नमः ।
श्री संवत्सराय नमः ।
श्री दक्षाय नमः ।
श्री विश्रामाय नमः ।
श्री विश्वदक्षिणाय नमः ।
श्री विस्ताराय नमः ।
श्री स्थावरस्थाणवे नमः ।
श्री प्रमाणाय नमः ।
श्री बीजाय अव्ययाय नमः ।
श्री अर्थाय नमः । ४३० ॥
श्री अनर्थाय नमः ।
श्री महाकोशाय नमः ।
श्री महाभोगाय नमः ।
श्री महाधनाय नमः ।
श्री अनिर्विण्णाय नमः ।
श्री स्थविष्ठाय नमः ।
श्री भुवे नमः ।
श्री धर्मयूपाय नमः ।
श्री महामखाय नमः ।
श्री नक्षत्रनेमये नमः । ४४० ॥
श्री नक्षित्रिणे नमः ।
श्री क्षमाय नमः ।
श्री क्षामाय नमः ।
श्री समीहनाय नमः ।
श्री यज्ञाय नमः ।
श्री इज्याय नमः ।
श्री महेज्याय नमः ।
श्री क्रतवे नमः ।
श्री सत्राय नमः ।
श्री सताङ्गतये नमः । ४५० ॥
श्री सर्वदर्शिने नमः ।
श्री विमुक्तात्मने नमः ।
श्री सर्वज्ञाय नमः ।
श्री ज्ञानमुत्तमाय नमः ।
श्री सुव्रताय नमः ।
श्री सुमुखाय नमः ।
श्री सूक्ष्माय नमः ।
श्री सुघोषाय नमः ।
श्री सुखदाय नमः ।
श्री सुहृदे नमः । ४६० ॥
श्री मनोहराय नमः ।
श्री जितक्रोधाय नमः ।
श्री वीरबाहवे नमः ।
श्री विदारणाय नमः ।
श्री स्वापनाय नमः ।
श्री स्ववशाय नमः ।
श्री व्यापिने नमः ।
श्री नैकात्मने नमः ।
श्री नैककर्मकृते नमः ।
श्री वत्सराय नमः । ४७० ॥
श्री वत्सलाय नमः ।
श्री वत्सिने नमः ।
श्री रत्नगर्भाय नमः ।
श्री धनेश्वराय नमः ।
श्री धर्मगुप्ते नमः ।
श्री धर्मकृते नमः ।
श्री धर्मिणे नमः ।
श्री सते नमः ।
श्री असते नमः ।
श्री क्षराय नमः । ४८० ॥
श्री अक्षराय नमः ।
श्री अविज्ञात्रे नमः ।
श्री सहस्रांशवे नमः ।
श्री विधात्रे नमः ।
श्री कृतलक्षणाय नमः ।
श्री गभस्तिनेमये नमः ।
श्री सत्त्वस्थाय नमः ।
श्री सिंहाय नमः ।
श्री भूतमहेश्वराय नमः ।
श्री आदिदेवाय नमः । ४९० ॥
श्री महादेवाय नमः ।
श्री देवेशाय नमः ।
श्री देवभृद्गुरवे नमः ।
श्री उत्तराय नमः ।
श्री गोपतये नमः ।
श्री गोप्त्रे नमः ।
श्री ज्ञानगम्याय नमः ।
श्री पुरातनाय नमः ।
श्री शरीरभूतभृते नमः ।
श्री भोक्त्रे नमः । ५०० ॥
श्री कपीन्द्राय नमः ।
श्री भूरिदक्षिणाय नमः ।
श्री सोमपाय नमः ।
श्री अमृतपाय नमः ।
श्री सोमाय नमः ।
श्री पुरुजिते नमः ।
श्री पुरुसत्तमाय नमः ।
श्री विनयाय नमः ।
श्री जयाय नमः ।
श्री सत्यसन्धाय नमः । ५१० ॥
श्री दाशार्हाय नमः ।
श्री सात्वतां पतये नमः ।
श्री जीवाय नमः ।
श्री विनयितासाक्षिणे नमः ।
श्री मुकुन्दाय नमः ।
श्री अमितविक्रमाय नमः ।
श्री अम्भोनिधये नमः ।
श्री अनन्तात्मने नमः ।
श्री महोदधिशयाय नमः ।
श्री अन्तकाय नमः । ५२० ॥
श्री अजाय नमः ।
श्री महार्हाय नमः ।
श्री स्वाभाव्याय नमः ।
श्री जितामित्राय नमः ।
श्री प्रमोदनाय नमः ।
श्री आनन्दाय नमः ।
श्री नन्दनाय नमः ।
श्री नन्दाय नमः ।
श्री सत्यधर्मणे नमः ।
श्री त्रिविक्रमाय नमः । ५३० ॥
श्री महर्षये कपिलाचार्याय नमः ।
श्री कृतज्ञाय नमः ।
श्री मेदिनीपतये नमः ।
श्री त्रिपदाय नमः ।
श्री त्रिदशाध्यक्षाय नमः ।
श्री महाशृङ्गाय नमः ।
श्री कृतान्तकृते नमः ।
श्री महावराहाय नमः ।
श्री गोविन्दाय नमः ।
श्री सुषेणाय नमः । ५४० ॥
श्री कनकाङ्गदिने नमः ।
श्री गुह्याय नमः ।
श्री गभीराय नमः ।
श्री गहनाय नमः ।
श्री गुप्ताय नमः ।
श्री चक्रगदाधराय नमः ।
श्री वेधसे नमः ।
श्री स्वाङ्गाय नमः ।
श्री अजिताय नमः ।
श्री कृष्णाय नमः । ५५० ॥
श्री दृढाय नमः ।
श्री सङ्कर्षणाय अच्युताय नमः ।
श्री वरुणाय नमः ।
श्री वारुणाय नमः ।
श्री वृक्षाय नमः ।
श्री पुष्कराक्षाय नमः ।
श्री महामनसे नमः ।
श्री भगवते नमः ।
श्री भगघ्ने नमः ।
श्री आनन्दिने नमः । ५६० ॥
श्री वनमालिने नमः ।
श्री हलायुधाय नमः ।
श्री आदित्याय नमः ।
श्री ज्योतिरादित्याय नमः ।
श्री सहिष्णुवे नमः ।
श्री गतिसत्तमाय नमः ।
श्री सुधन्वने नमः ।
श्री खण्डपरशवे नमः ।
श्री दारुणाय नमः ।
श्री द्रविणप्रदाय नमः । ५७० ॥
श्री दिवस्पृशे नमः ।
श्री सर्वदृग्व्यासाय नमः ।
श्री वाचस्पतये अयोनिजाय नमः ।
श्री त्रिसाम्ने नमः ।
श्री सामगाय नमः ।
श्री साम्ने नमः ।
श्री निर्वाणाय नमः ।
श्री भेषजाय नमः ।
श्री भिषजे नमः ।
श्री सन्न्यासकृते नमः । ५८० ॥
श्री शमाय नमः ।
श्री शान्ताय नमः ।
श्री निष्ठायै नमः ।
श्री शान्त्यै नमः ।
श्री परायणाय नमः ।
श्री शुभाङ्गाय नमः ।
श्री शान्तिदाय नमः ।
श्री स्रष्टाय नमः ।
श्री कुमुदाय नमः ।
श्री कुवलेशयाय नमः । ५९० ॥
श्री गोहिताय नमः ।
श्री गोपतये नमः ।
श्री गोप्त्रे नमः ।
श्री वृषभाक्षाय नमः ।
श्री वृषप्रियाय नमः ।
श्री अनिवर्तिने नमः ।
श्री निवृत्तात्मने नमः ।
श्री सङ्क्षेप्त्रे नमः ।
श्री क्षेमकृते नमः ।
श्री शिवाय नमः । ६०० ॥
श्री श्रीवत्सवक्षसे नमः ।
श्री श्रीवासाय नमः ।
श्री श्रीपतये नमः ।
श्री श्रीमतां वराय नमः ।
श्री श्रीदाय नमः ।
श्री श्रीशाय नमः ।
श्री श्रीनिवासाय नमः ।
श्री श्रीनिधये नमः ।
श्री श्रीविभावनाय नमः ।
श्री श्रीधराय नमः । ६१० ॥
श्री श्रीकराय नमः ।
श्री श्रेयसे नमः ।
श्री श्रीमते नमः ।
श्री लोकत्रयाश्रयाय नमः ।
श्री स्वक्षाय नमः ।
श्री स्वङ्गाय नमः ।
श्री शतानन्दाय नमः ।
श्री नन्दिने नमः ।
श्री ज्योतिर्गणेश्वराय नमः ।
श्री विजितात्मने नमः । ६२० ॥
श्री विधेयात्मने नमः ।
श्री सत्कीर्तये नमः ।
श्री छिन्नसंशयाय नमः ।
श्री उदीर्णाय नमः ।
श्री सर्वतश्चक्षुषे नमः ।
श्री अनीशाय नमः ।
श्री शाश्वतस्थिराय नमः ।
श्री भूशयाय नमः ।
श्री भूषणाय नमः ।
श्री भूतये नमः । ६३० ॥
श्री विशोकाय नमः ।
श्री शोकनाशनाय नमः ।
श्री अर्चिष्मते नमः ।
श्री अर्चिताय नमः ।
श्री कुम्भाय नमः ।
श्री विशुद्धात्मने नमः ।
श्री विशोधनाय नमः ।
श्री अनिरुद्धाय नमः ।
श्री अप्रतिरथाय नमः ।
श्री प्रद्युम्नाय नमः । ६४० ॥
श्री अमितविक्रमाय नमः ।
श्री कालनेमिनिघ्ने नमः ।
श्री वीराय नमः ।
श्री शौरये नमः ।
श्री शूरजनेश्वराय नमः ।
श्री त्रिलोकात्मने नमः ।
श्री त्रिलोकेशाय नमः ।
श्री केशवाय नमः ।
श्री केशिघ्ने नमः ।
श्री हरये नमः । ६५० ॥
श्री कामदेवाय नमः ।
श्री कामपालाय नमः ।
श्री कामिने नमः ।
श्री कान्ताय नमः ।
श्री कृतागमाय नमः ।
श्री अनिर्देश्यवपुषे नमः ।
श्री विष्णवे नमः ।
श्री वीराय नमः ।
श्री अनन्ताय नमः ।
श्री धनञ्जयाय नमः । ६६० ॥
श्री ब्रह्मण्याय नमः ।
श्री ब्रह्मकृते नमः ।
श्री ब्रह्मणे नमः ।
श्री ब्राह्मणे नमः ।
श्री ब्रह्माय नमः ।
श्री ब्रह्मविवर्धनाय नमः ।
श्री ब्रह्मविदे नमः ।
श्री ब्राह्मणाय नमः ।
श्री ब्रह्मिणे नमः ।
श्री ब्रह्मज्ञाय नमः । ६७० ॥
श्री ब्राह्मणप्रियाय नमः ।
श्री महाक्रमाय नमः ।
श्री महाकर्मणे नमः ।
श्री महातेजसे नमः ।
श्री महोरगाय नमः ।
श्री महाक्रतवे नमः ।
श्री महायज्विने नमः ।
श्री महायज्ञाय नमः ।
श्री महाहविषे नमः ।
श्री स्तव्याय नमः । ६८० ॥
श्री स्तवप्रियाय नमः ।
श्री स्तोत्राय नमः ।
श्री स्तुतये नमः ।
श्री स्तोत्रे नमः ।
श्री रणप्रियाय नमः ।
श्री पूर्णाय नमः ।
श्री पूरयित्रे नमः ।
श्री पुण्याय नमः ।
श्री पुण्यकीर्तये नमः ।
श्री अनामयाय नमः । ६९० ॥
श्री मनोजवाय नमः ।
श्री तीर्थकराय नमः ।
श्री वसुरेतसे नमः ।
श्री वसुप्रदाय नमः ।
श्री वासुदेवाय नमः ।
श्री वसवे नमः ।
श्री वसुमनसे नमः ।
श्री हविषे नमः ।
श्री हविषे नमः ।
श्री सद्गतये नमः । ७०० ॥
श्री सत्कृतये नमः ।
श्री सत्तायै नमः ।
श्री सद्भूतये नमः ।
श्री सत्परायणाय नमः ।
श्री शूरसेनाय नमः ।
श्री यदुश्रेष्ठाय नमः ।
श्री सन्निवासाय नमः ।
श्री सुयामुनाय नमः ।
श्री भूतावासाय नमः ।
श्री वासुदेवाय नमः । ७१० ॥
श्री सर्वासुनिलयाय नमः ।
श्री अनलाय नमः ।
श्री दर्पघ्ने नमः ।
श्री दर्पदाय नमः ।
श्री दृप्ताय नमः ।
श्री दुर्धराय नमः ।
श्री अपराजिताय नमः ।
श्री विश्वमूर्तये नमः ।
श्री महामूर्तये नमः ।
श्री दीप्तमूर्तये नमः । ७२० ॥
श्री अमूर्तिमते नमः ।
श्री अनेकमूर्तये नमः ।
श्री अव्यक्ताय नमः ।
श्री शतमूर्तये नमः ।
श्री शताननाय नमः ।
श्री एकैस्मै नमः ।
श्री नैकस्मै नमः ।
श्री सवाय नमः ।
श्री काय नमः ।
श्री कस्मै नमः । ७३० ॥
श्री यस्मै नमः ।
श्री तस्मै नमः ।
श्री पदमनुत्तमाय नमः ।
श्री लोकबन्धवे नमः ।
श्री लोकनाथाय नमः ।
श्री माधवाय नमः ।
श्री भक्तवत्सलाय नमः ।
श्री सुवर्णवर्णाय नमः ।
श्री हेमाङ्गाय नमः ।
श्री वराङ्गाय नमः । ७४० ॥
श्री चन्दनाङ्गदिने नमः ।
श्री वीरघ्ने नमः ।
श्री विषमाय नमः ।
श्री शून्याय नमः ।
श्री घृताशिषे नमः ।
श्री अचलाय नमः ।
श्री चलाय नमः ।
श्री अमानिने नमः ।
श्री मानदाय नमः ।
श्री मान्याय नमः । ७५० ॥
श्री लोकस्वामिने नमः ।
श्री त्रिलोकधृषे नमः ।
श्री सुमेधसे नमः ।
श्री मेधजाय नमः ।
श्री धन्याय नमः ।
श्री सत्यमेधसे नमः ।
श्री धराधराय नमः ।
श्री तेजोवृषाय नमः ।
श्री द्युतिधराय नमः ।
श्री सर्वशस्त्रभृतांवराय नमः । ७६० ॥
श्री प्रग्रहाय नमः ।
श्री निग्रहाय नमः ।
श्री व्यग्राय नमः ।
श्री नैकशृङ्गाय नमः ।
श्री गदाग्रजाय नमः ।
श्री चतुर्मूर्तये नमः ।
श्री चतुर्बाहवे नमः ।
श्री चतुर्व्यूहाय नमः ।
श्री चतुर्गतये नमः ।
श्री चतुरात्मने नमः । ७७० ॥
श्री चतुर्भावाय नमः ।
श्री चतुर्वेदविदे नमः ।
श्री एकपदे नमः ।
श्री समावर्ताय नमः ।
श्री अनिवृत्तात्मने नमः ।
श्री दुर्जयाय नमः ।
श्री दुरतिक्रमाय नमः ।
श्री दुर्लभाय नमः ।
श्री दुर्गमाय नमः ।
श्री दुर्गाय नमः । ७८० ॥
श्री दुरावासाय नमः ।
श्री दुरारिघ्ने नमः ।
श्री शुभाङ्गाय नमः ।
श्री लोकसारङ्गाय नमः ।
श्री सुतन्तवे नमः ।
श्री तन्तुवर्धनाय नमः ।
श्री इन्द्रकर्मणे नमः ।
श्री महाकर्मणे नमः ।
श्री कृतकर्मणे नमः ।
श्री कृतागमाय नमः । ७९० ॥
श्री उद्भवाय नमः ।
श्री सुन्दराय नमः ।
श्री सुन्दाय नमः ।
श्री रत्ननाभाय नमः ।
श्री सुलोचनाय नमः ।
श्री अर्काय नमः ।
श्री वाजसनाय नमः ।
श्री शृङ्गिने नमः ।
श्री जयन्ताय नमः ।
श्री सर्वविज्जयिने नमः । ८०० ॥
श्री सुवर्ण बिन्दवे नमः
श्री अक्षोभ्याय नमः ।
श्री सर्ववागीश्वरेश्वराय नमः ।
श्री महाह्रदाय नमः ।
श्री महागर्ताय नमः ।
श्री महाभूताय नमः ।
श्री महानिधये नमः ।
श्री कुमुदाय नमः ।
श्री कुन्दराय नमः ।
श्री कुन्दाय नमः । ८१० ॥
श्री पर्जन्याय नमः ।
श्री पावनाय नमः ।
श्री अनिलाय नमः ।
श्री अमृतांशाय नमः ।
श्री अमृतवपुषे नमः ।
श्री सर्वज्ञाय नमः ।
श्री सर्वतोमुखाय नमः ।
श्री सुलभाय नमः ।
श्री सुव्रताय नमः ।
श्री सिद्धाय नमः । ८२० ॥
श्री शत्रुजिते नमः ।
श्री शत्रुतापनाय नमः ।
श्री न्यग्रोधाय नमः ।
श्री उदुम्बराय नमः ।
श्री अश्वत्थाय नमः ।
श्री चाणूरान्ध्रनिषूदनाय नमः ।
श्री सहस्रार्चिषे नमः ।
श्री सप्तजिह्वाय नमः ।
श्री सप्तैधसे नमः ।
श्री सप्तवाहनाय नमः । ८३० ॥
श्री अमूर्तये नमः ।
श्री अनघाय नमः ।
श्री अचिन्त्याय नमः ।
श्री भयकृते नमः ।
श्री भयनाशनाय नमः ।
श्री अणवे नमः ।
श्री बृहते नमः ।
श्री कृशाय नमः ।
श्री स्थूलाय नमः ।
श्री गुणभृते नमः । ८४० ॥
श्री निर्गुणाय नमः ।
श्री महते नमः ।
श्री अधृताय नमः ।
श्री स्वधृताय नमः ।
श्री स्वास्थ्याय नमः ।
श्री प्राग्वंशाय नमः ।
श्री वंशवर्धनाय नमः ।
श्री भारभृते नमः ।
श्री कथिताय नमः ।
श्री योगिने नमः । ८५० ॥
श्री योगीशाय नमः ।
श्री सर्वकामदाय नमः ।
श्री आश्रमाय नमः ।
श्री श्रमणाय नमः ।
श्री क्षामाय नमः ।
श्री सुपर्णाय नमः ।
श्री वायुवाहनाय नमः ।
श्री धनुर्धराय नमः ।
श्री धनुर्वेदाय नमः ।
श्री दण्डाय नमः । ८६० ॥
श्री दमयित्रे नमः ।
श्री दमाय नमः ।
श्री अपराजिताय नमः ।
श्री सर्वसहाय नमः ।
श्री नियन्त्रे नमः ।
श्री नियमाय नमः ।
श्री यमाय नमः ।
श्री सत्त्ववते नमः ।
श्री सात्त्विकाय नमः ।
श्री सत्याय नमः । ८७० ॥
श्री सत्यधर्मपरायणाय नमः ।
श्री अभिप्रायाय नमः ।
श्री प्रियार्हाय नमः ।
श्री अर्हाय नमः ।
श्री प्रियकृते नमः ।
श्री प्रीतिवर्धनाय नमः ।
श्री विहायसगतये नमः ।
श्री ज्योतिषे नमः ।
श्री सुरुचये नमः ।
श्री हुतभुजे नमः । ८८० ॥
श्री विभवे नमः ।
श्री रवये नमः ।
श्री विरोचनाय नमः ।
श्री सूर्याय नमः ।
श्री सवित्रे नमः ।
श्री रविलोचनाय नमः ।
श्री अनन्ताय नमः ।
श्री हुतभुजे नमः ।
श्री भोक्त्रे नमः ।
श्री सुखदाय नमः । ८९० ॥
श्री नैकजाय नमः ।
श्री अग्रजाय नमः ।
श्री अनिर्विण्णाय नमः ।
श्री सदामर्षिणे नमः ।
श्री लोकाधिष्ठानाय नमः ।
श्री अद्भुताय नमः ।
श्री सनातनाय नमः ।
श्री सनातनतमाय नमः ।
श्री कपिलाय नमः ।
श्री कपये नमः । ९०० ॥
श्री अव्ययाय नमः ।
श्री स्वस्तिदाय नमः ।
श्री स्वस्तिकृते नमः ।
श्री स्वस्तये नमः ।
श्री स्वस्तिभुजे नमः ।
श्री स्वस्तिदक्षिणाय नमः ।
श्री अरौद्राय नमः ।
श्री कुण्डलिने नमः ।
श्री चक्रिणे नमः ।
श्री विक्रमिणे नमः । ९१० ॥
श्री उर्जितशासनाय नमः ।
श्री शब्दातिगाय नमः ।
श्री शब्दसहाय नमः ।
श्री शिशिराय नमः ।
श्री शर्वरीकराय नमः ।
श्री अक्रूराय नमः ।
श्री पेशलाय नमः ।
श्री दक्षाय नमः ।
श्री दक्षिणाय नमः ।
श्री क्षमिणां वराय नमः । ९२० ॥
श्री विद्वत्तमाय नमः ।
श्री वीतभयाय नमः ।
श्री पुण्यश्रवणकीर्तनाय नमः ।
श्री उत्तारणाय नमः ।
श्री दुष्कृतिघ्ने नमः ।
श्री पुण्याय नमः ।
श्री दुस्वप्ननाशाय नमः ।
श्री वीरघ्ने नमः ।
श्री रक्षणाय नमः ।
श्री सद्भ्यो नमः । ९३० ॥
श्री जीवनाय नमः ।
श्री पर्यवस्थिताय नमः ।
श्री अनन्तरूपाय नमः ।
श्री अनन्तश्रिये नमः ।
श्री जितमन्यवे नमः ।
श्री भयापहाय नमः ।
श्री चतुरश्राय नमः ।
श्री गभीरात्मने नमः ।
श्री विदिशाय नमः ।
श्री व्याधिशाय नमः । ९४० ॥
श्री दिशाय नमः ।
श्री अनादये नमः ।
श्री भूर्भुवाय नमः ।
श्री लक्ष्मै नमः ।
श्री सुवीराय नमः ।
श्री रुचिराङ्गदाय नमः ।
श्री जननाय नमः ।
श्री जनजन्मादये नमः ।
श्री भीमाय नमः ।
श्री भीमपराक्रमाय नमः । ९५० ॥
श्री आधारनिलयाय नमः ।
श्री धात्रे नमः ।
श्री पुष्पहासाय नमः ।
श्री प्रजागराय नमः ।
श्री उर्ध्वगाय नमः ।
श्री सत्पथाचाराय नमः ।
श्री प्राणदाय नमः ।
श्री प्रणवाय नमः ।
श्री पणाय नमः ।
श्री प्रमाणाय नमः । ९६० ॥
श्री प्राणनिलयाय नमः ।
श्री प्राणभृते नमः ।
श्री प्राणजीवनाय नमः ।
श्री तत्त्वाय नमः ।
श्री तत्त्वविदे नमः ।
श्री एकात्मने नमः ।
श्री जन्ममृत्युजरातिगाय नमः ।
श्री भुर्भुवः स्वस्तरवे नमः
श्री ताराय नमः ।
श्री सवित्रे नमः । ९७० ॥
श्री प्रपितामहाय नमः ।
श्री यज्ञाय नमः ।
श्री यज्ञपतये नमः ।
श्री यज्वने नमः ।
श्री यज्ञाङ्गाय नमः ।
श्री यज्ञवाहनाय नमः ।
श्री यज्ञभृते नमः ।
श्री यज्ञकृते नमः ।
श्री यज्ञिने नमः ।
श्री यज्ञभुजे नमः । ९८० ॥
श्री यज्ञसाधनाय नमः ।
श्री यज्ञान्तकृते नमः ।
श्री यज्ञगुह्याय नमः ।
श्री अन्नाय नमः ।
श्री अन्नदाय नमः ।
श्री आत्मयोनये नमः ।
श्री स्वयञ्जाताय नमः ।
श्री वैखानाय नमः ।
श्री सामगायनाय नमः ।
श्री देवकीनन्दनाय नमः । ९९० ॥
श्री स्रष्ट्रे नमः ।
श्री क्षितीशाय नमः ।
श्री पापनाशनाय नमः ।
श्री शङ्खभृते नमः ।
श्री नन्दकिने नमः ।
श्री चक्रिणे नमः ।
श्री शर्ङ्गधन्वने नमः ।
श्री गदाधराय नमः ।
श्री रथाङ्गपाणये नमः ।
श्री अक्षोभ्याय नमः । १००० ॥
श्री सर्वप्रहरणायुधाय नमः
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